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पेशवा बाजीराव से रानी बैजाबाई तक... अहिल्याबाई के अलावा किस-किस ने संवारा था मणिकर्णिका घाट - AajTak

By Aravind Sharma Published January 21, 2026
**सत्य संवाद विशेष रिपोर्ट**

**पेशवा बाजीराव से रानी बैजाबाई तक... अहिल्याबाई के अलावा किस-किस ने संवारा था मणिकर्णिका घाट**

मोक्षदायिनी काशी का मणिकर्णिका घाट न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह भारतीय इतिहास के सांस्कृतिक पुनरुद्धार की एक जीवंत गाथा भी है। जब भी इस घाट के जीर्णोद्धार और इसके वैभव की चर्चा होती है, तो देवी अहिल्याबाई होल्कर का नाम सबसे पहले और प्रमुखता से लिया जाता है। 18वीं शताब्दी में उन्होंने विदेशी आक्रांताओं द्वारा खंडित किए गए इस घाट को न केवल नया स्वरूप दिया, बल्कि यहाँ के मंदिरों और कुंड का भव्य निर्माण भी कराया। हालांकि, इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि मणिकर्णिका की यह भव्यता केवल एक शासक की देन नहीं है। पेशवा बाजीराव प्रथम से लेकर ग्वालियर की रानी बैजाबाई तक, कई महान विभूतियों ने इस पावन स्थल के संरक्षण और सौंदर्यीकरण में अपना अमूल्य योगदान दिया है।

मराठा साम्राज्य के विस्तार के साथ ही पेशवाओं ने काशी को सांस्कृतिक राजधानी के रूप में विकसित करने का बीड़ा उठाया था। पेशवा बाजीराव प्रथम के कार्यकाल में काशी के घाटों के पक्कीकरण और सुदृढ़ीकरण की नींव रखी गई। पेशवाओं ने मणिकर्णिका घाट की संरचना को मजबूती देने के लिए न केवल विशाल पत्थरों का उपयोग करवाया, बल्कि गंगा की लहरों के कटाव से घाट को बचाने के लिए विशेष वास्तुशिल्प का सहारा लिया। मराठा शासकों के लिए काशी के घाटों का निर्माण उनके धर्मपरायण स्वभाव और भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा का प्रतीक था। बाजीराव के बाद भी अन्य पेशवाओं ने समय-समय पर यहाँ के मंदिरों और विश्राम गृहों के रखरखाव के लिए भारी दान दिया।

19वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में ग्वालियर की रानी बैजाबाई सिंधिया ने मणिकर्णिका घाट के कायाकल्प में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। वर्ष 1830 के आसपास, जब प्राकृतिक आपदाओं और समय के प्रभाव से घाट के कुछ हिस्से जर्जर होने लगे थे, तब रानी बैजाबाई ने व्यापक स्तर पर इसके पुनरुद्धार का कार्य संपन्न कराया। उन्होंने न केवल मणिकर्णिका कुंड (जिसे चक्र-पुष्करिणी भी कहा जाता है) की मरम्मत कराई, बल्कि घाट के ऊपरी हिस्से में स्थित भव्य इमारतों और छतरियों का निर्माण भी करवाया। उनके द्वारा कराए गए निर्माण कार्यों की सूक्ष्म वास्तुकला आज भी श्रद्धालुओं को प्रभावित करती है और यह सिद्ध करती है कि सिंधिया राजवंश ने काशी की विरासत को अक्षुण्ण रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

निष्कर्षतः, मणिकर्णिका घाट का वर्तमान स्वरूप विभिन्न कालखंडों में किए गए सामूहिक प्रयासों और अटूट श्रद्धा का परिणाम है। इसमें अमेठी के राजा, बनारस स्टेट के राजाओं और अन्य कई छोटे-बड़े रियासतदारों का भी सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आज जब श्रद्धालु मणिकर्णिका की सीढ़ियों पर कदम रखते हैं, तो उन्हें अहिल्याबाई होल्कर की भक्ति, पेशवाओं का साहस और रानी बैजाबाई की कलात्मक दृष्टि का संगम महसूस होता है। यह घाट उन महान भारतीय शासकों की याद दिलाता है जिन्होंने कठिन समय में भी अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों को संवारने का संकल्प लिया था, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहें।

लेखन: सत्य संवाद न्यूज़ डेस्क | साभार: Google News

Aravind Sharma

Senior Political Correspondent with 15 years of experience.

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