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न लिया नाम और न मिलाया हाथ, एक मंच पर होकर भी दिखी दूरी; राहुल ने थरूर को क्यों नहीं दिया भाव? - Zee News

By Aravind Sharma Published January 20, 2026
**न लिया नाम और न मिलाया हाथ, एक मंच पर होकर भी दिखी दूरी; राहुल ने थरूर को क्यों नहीं दिया भाव?**

हाल ही में आयोजित एक सार्वजनिक मंच पर कांग्रेस के दो दिग्गज नेताओं, राहुल गांधी और शशि थरूर के बीच दिखी 'कोल्ड वॉर' ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। एक ही मंच पर उपस्थित होने के बावजूद दोनों नेताओं के बीच किसी भी प्रकार का संवाद न होना, न केवल मीडिया बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी शोध का विषय बन गया है। कैमरों की नजरों ने साफ तौर पर दर्ज किया कि कैसे राहुल गांधी ने थरूर की मौजूदगी को लगभग नजरअंदाज किया, जिससे पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक न होने के संकेत मिल रहे हैं।

कार्यक्रम के दौरान मंच की तस्वीरों ने एक अजीब सी असहजता को बयां किया। जहां राहुल गांधी अन्य नेताओं के साथ गर्मजोशी से मिल रहे थे और हंसी-मजाक कर रहे थे, वहीं शशि थरूर के साथ उन्होंने न तो हाथ मिलाया और न ही औपचारिक अभिवादन किया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि अपने संबोधन के दौरान भी राहुल ने थरूर का नाम तक नहीं लिया, जबकि मंच पर आसीन अन्य प्रमुख नेताओं का सम्मानजनक जिक्र किया गया। इस व्यवहार ने यह स्पष्ट कर दिया कि दोनों नेताओं के बीच की दूरी अब केवल वैचारिक नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवहार में भी उभरकर सामने आ गई है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस खींचतान की जड़ें पार्टी के आंतरिक समीकरणों और शशि थरूर की स्वतंत्र कार्यशैली में छिपी हो सकती हैं। कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने के थरूर के फैसले और समय-समय पर पार्टी की आधिकारिक लाइन से इतर दिए गए उनके बयानों ने शायद शीर्ष नेतृत्व के साथ उनके संबंधों में कड़वाहट पैदा की है। राहुल गांधी द्वारा उन्हें 'भाव' न दिया जाना एक कड़ा संदेश माना जा रहा है कि पार्टी के भीतर वफादारी और अनुशासन को सर्वोपरि रखा जाएगा। थरूर जैसे वैश्विक कद वाले नेता की इस तरह की उपेक्षा कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी को भी उजागर करती है।

कुल मिलाकर, राहुल गांधी और शशि थरूर के बीच की यह दूरी कांग्रेस के लिए आने वाले समय में चुनौतीपूर्ण हो सकती है। एक तरफ जहां पार्टी 'भारत जोड़ो' जैसे अभियानों के जरिए एकजुटता का संदेश देने की कोशिश कर रही है, वहीं शीर्ष नेताओं के बीच का यह ठंडा व्यवहार कार्यकर्ताओं के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या आने वाले समय में यह बर्फ पिघलेगी या फिर थरूर को किनारे करने की यह रणनीति पार्टी के भीतर किसी नए विवाद को जन्म देगी।

लेखन: सत्य संवाद न्यूज़ डेस्क | साभार: Google News

Aravind Sharma

Senior Political Correspondent with 15 years of experience.

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